2 सितंबर 2020 - 13:20
सऊदी अरब, राजकुमारों की गिरफ़्तारियों के बाद अब सैनिकों का नंबर या विरोधियों को रास्ते से हटाने का फ़ॉर्मूला है?

सऊदी अरब में 200 से अधिक राजकुमारों की गिरफ़्तारी और उन्हें एक होटल में नज़रबंद किए जाने तथा पूर्व क्राउन प्रिंस की धरपकड़ और अलजबरी की गिरफ़्तारी के बाद अब विरोधी सैनिकों का नंबर आ गया है।

यमन के विरुद्ध अरब गठबंधन के कमान्डर फ़हद बिन तुर्की पर लगे आरोपों में ज़रा भी सच्चाई हुई तो इसका सबसे पहला अर्थ यह है कि यमन में जारी पांच सालों की जंग, बिन सलमान की सत्ता की भूख मिटाने के लिए छेड़ी गयी थी और इस कमान्डर सहित बहुत से सैन्य और सिविल अधिकारियों की जेबें गर्म करने और भ्रष्टाचार के लिए ग़रीबों और निर्धनों के विरुद्ध तोप के दहाने खोल दिए गये थे।

अभी तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल सका है कि बिन सलमान के रक्षामंत्रालय में होने पर किस प्रकार इस मंत्रालय का दुरुपयोग किया गया और वह इस विषय पर आंख मूंदे रहे।

यहां पर यह नतीजा निकाला जा सकता है कि इन आरोपों में तनिक भी सच्चाई नहीं है और यह केवल सऊदी अरब के सैन्य सिस्टम में प्रभावी व्यक्ति से हिसाब चुकता करने के उद्देश्य से है और यह बिन सलमान द्वारा अपने विरोधियों को रास्ते से हटाने की परिधि में ही अंजाम पा रहा है।

यह कि आरंभ से ही आरोप स्पष्ट थे किन्तु कुछ कारणों की वजह से फ़हद बिन तुर्की को नहीं छेड़ा गया या कि रक्षामंत्रालय के नेतृत्व के दौरान बिन सलमान का प्रबंधन इतना कमज़ोर था कि फ़हद बिन तुर्की जैसे लोगों के लिए वर्षों से यह संभावना बनी रही कि वह कमज़ोर प्रबंधन और युवामंत्री की छत्रछाया में जमकर भ्रष्टाचार जारी रख सके।

यह बात स्पष्ट है कि इनमें से हर विकल्प हर एक के लिए समान हैं क्योंकि बिन सलमान सऊदी अरब की राजगद्दी पर बैठने के योग्य नहीं हैं।

अब आइये एक नज़र उस व्यक्ति पर डालते हैं जिसको फ़हद बिन तुर्की की जगह लाया गया है। यह वह व्यक्ति है जिसने बिन सलमान और सऊदी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा 2011 में बहरैन की जनता के दमन और अलजज़ीरा नामक सैन्य आप्रेशन करके साबित की है।

अब केवल यह देखना बाक़ी है कि पांच साल से जारी यमन युद्ध की विफलता का ठिकरा फ़हद बिन तुर्की के सिर फोड़ दिया जाएगा और उन को क़ानून के कटहरे में खड़ा करके और अन्य सैन्य अधिकारियों को हटाकर कर यमन युद्ध मे बिन सलमान की विफलता पर पर्दा डाल दिया जाएगा।

वास्तव में यमन के विरुद्ध बने गठबंधन का केवल नाम ही बाक़ी रह गया है जिनमें अब केवल सऊदी अरब और इमारात ही हैं किन्तु संयुक्त अरब इमारात का इस परिवर्तन पर अर्थपूर्ण मौन आश्चर्यजनक है। अब यह सवाल पैदा होता है कि फ़हद बिन तुर्की पर जो आरोप लगे हैं क्या वह उनके द्वारा इमारात का पक्ष लेने की वजह से तो नहीं है? यह तो समय ही बताएगा।